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आध्यात्मिक दृष्टि से प्रेम प्रसंग कैसा होता है??

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 आध्यात्मिक दृष्टि से प्रेम प्रसंग कैसा होता है?? उत्तर :- जो चरित्रहीन लड़के-लड़की होते हैं, वे चलते समय अजीबो-गरीब ऐक्टिंग करते हैं। उन लजमारों की दृष्टि भी टेढ़ी-मेढ़ी चलती है। कभी बनावटी मुस्कराना। मुड़-मुड़कर आगे-पीछे देखना। चटक-मटककर चलना उन पापात्माओं  शौक होता है जो अंत में प्रेम विवाह का रूप बन जाता है। बाद में उनको पता चलता है कि दोनों के अन्य भी प्रेमी-प्रमिकाऐं थी। फिर उनकी दशा भगवान शिवजी-पार्वती वाली होती है। न घर के रहते हैं, न घाट के। विवाह करने का उद्देश्य ऊपर बता दिया है। इससे हटकर जो भी कदम युवा उठाते हैं, वह जीवन सफर को नरक बनाने वाला होता है। यदि किसी का प्रेम सम्बन्ध भी बन जाए तो इस बात का ध्यान अवश्य रखे कि अपने समाज की मर्यादा (जैसे गोत्र , गाँव तथा विवाह क्षेत्र ) भंग न होती हो जिससे कुल व माता-पिता की इज्जत को ठेस पहुँचे। गलती से ऐसा हो भी जाए और बाद में पता चले तो लड़के-लड़की को चाहिए कि तुरंत उस प्रेम को तोड़ दें। अंतरजातिय विवाह वर्तमान में करने में कोई हानि नहीं है, परंतु उपरोक्त मर्यादा का ध्यान अवश्य रखें। भगवान शिव जी ने भी देवी पार्वती को इसी ...

भक्ति न करने से बहुत दुःख होगा

सूक्ष्मवेद में कहा है:- यह संसार समझदा नाहीं, कहंदा शाम दुपहरे नूँ। गरीबदास यह वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूँ।। आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में परमात्मा के विधान से अपरिचित होने के कारण यह प्राणी इस दुःखों के घर संसार में महान कष्ट झेल रहा है और इसी को सुख स्थान मान रहा है। जैसे एक व्यक्ति जून के महीने मंे दिन के 12 या 1 बजे, हरियाणा प्रान्त में शराब पीकर चिलचिलाती धूप में गिरा पड़ा है, पसीनों से बुरा हाल है, रेत शरीर से लिपटा है। एक व्यक्ति ने कहा हे भाई! उठ, तुझे वृक्ष के नीचे बैठा दूँ, तू यहाँ पर गर्मी मंे जल रहा है। शराबी बोला कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मौज हो रही है, कोई कष्ट नहीं है। एक व्यक्ति किसी कारण कोर्ट में गया। वहाँ उसका रिश्तेदार मिला। एक-दूसरे से कुशल-मंगल पूछी, दोनों ने कहा, सब ठीक है, मौज है। एक व्यक्ति का इकलौता पुत्रा बहुत रोगी था। उसको च्ण्ळण्प्ण् में भर्ती करा रखा था। लड़के की बचने की आशा बहुत कम थी। ऐसी स्थिति में माता-पिता की क्या दशा होती है, आसानी से समझी जा सकती है। रिश्तेदार मिलने आए और पूछा कि बच्चे का...

Holi, are we truly celebrating in the right way?

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Holi, are we truly celebrating in the right way? Holi, is the festival of colors which is celebrated all across India with great enthusiasm. It is celebrated on the full moon day in the month of Fagun or Gregorian month of March. The festivities begin on the eve of Holi with lighting up of the pyre known as Holika Dhahan and the next day Holi is celebrated. This year Holi is falling on 09-10 of March 2020. The legend behind the festival states that the demon king Hiranyakashap wanted the people of his kingdom to worship him instead of god. Hiranyakashap’s son Prahlad, on the other hand, was a ardent devotee of lord Vishnu. Prahlad never accepted his father’s demand to worship him instead of lord Vishnu. Agitated with a strong denial from Prahlad, he devised a plan to kill his own son. He made several attempts to get him killed but in vain. One such attempt to kill Prahlad, involved Hiranyakashap’s sister Holika too. She was blessed that she will never get herself killed or hur...

।। कबीर भगवान की जितनी महिमा गाऊ कम है ।।

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 एक समय की बात है जब मुशलमानो के मुख्य पीर सेख तकी की बातो में आकर दिल्ली के राजा शिकन्दर लोधी  कबीर परमात्मा के हाथ पैरों को बेड़ियों से बंधवा कर एक शुखे कुए में डलवा देते है ओर कुए में बहुत सी तलवार त्रिशूल भाले डालकर ऊपर से  पत्थर ईंट मिट्टी आधि से  भरवा देते है ओर सेख तकी बड़ा खुश होता है कि अब कबीर जी के बचने का कोई चांस नही है  लेकिन जैसे ही वो राजमहल में आते है तो कबीर परमात्मा को सही सलामत सामने बैठा देख दंग रह जाते है कबीर परमात्मा के शरीर पर किसी खुरच का भी निशान नही था बोलो बन्दी छोड़ पूर्ण ब्रह्म कबीर भगवान की जय हो देखें साधना चैनल 7.30से 8.30 रोजाना

‘‘परमात्मा के लिए कुछ भी असंभव नहीं है’’

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एक नगर के बाहर जंगल में दो महात्मा साधना कर रहे थे। एक चालीस वर्ष से घर त्यागकर साधना कर रहा था। दूसरा अभी दो वर्ष से साधना करने लगा था। परमात्मा के दरबार से एक देवदूत प्रतिदिन कुछ समय उन दोनों साधकों के पास व्यतीत करता था। दोनों साधकों के आश्रम गाँव के पूर्व तथा पश्चिम में थे। बड़े का स्थान पश्चिम में तथा छोटे का स्थान गाँव के पूर्व में जंगल में था। देवदूत प्रतिदिन एक-एक घण्टा दोनों के पास बैठता, परमात्मा की चर्चा चलती। दोनों साधकों का अच्छा समय व्यतीत होता। एक दिन देवदूत ने भगवान विष्णु जी से कहा कि भगवान! कपिला नगरी के बाहर आपके दो परम भक्त रहते है। श्री विष्णु जी ने कहा कि एक परम भक्त हे, दूसरा तो बनावटी भक्त है। देवदूत ने विचार किया कि जो चालीस वर्ष से साधनारत है, वह पक्का भक्त होगा क्योंकि लंबी-लंबी दाढ़ी, सिर पर बड़ी जटा (केश) है और समय भी चालीस वर्ष बहुत होता है। देवदूत बोला कि हे प्रभु! जो चालीस वर्ष से आपकी भक्ति कर रहा है, वह होगा परम भक्त। प्रभु ने कहा, नहीं। दूसरा जो दो वर्ष से साधना में लगा है। प्रभु ने कहा कि देवदूत! मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ। देवदूत बोला, प्रभु ...

"जो भक्त भक्ति करता हैं उसे भक्त हीं कहते हैं?"

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"जो भक्त भक्ति करता हैं उसे भक्त हीं  कहते हैं?" मानव शरीर रूपी वस्त्र अनमोल हैं। तत्वज्ञान के अभाव से भक्ति न करके पाप पर पाप करके इस पर दाग लगा रहा है। इस संसार में जीवन अधिक नहीं है। अपने परिवार के पोषण में तथा धन संग्रह करने में जो परेशानी उठा रहा है। पाप करके धन जोड़ रहा है। मृत्यु के पश्चात् परिवार तथा संपत्ति धन बेगानी हो जाएगी। इसे जोड़ने में किए पाप तुझे नरक में जलाऐंगे। पाप करके दूसरे की (बिरानी) आग में न जलकर मर।  सत्संग सुने बिना पाप-पुण्य तथा शिष्टाचार का ज्ञान नहीं होता। मानव शरारती बुद्धि का हो जाता है। मानवता को भूलकर अपनी शक्ति के द्वारा निर्बल को सताकर सर्प वाला कार्य कर रहा है जो तेरे नाश का कारण बनता है। हे सज्जन पुरूष! यह ज्ञान है जो बिना प्रेम व सच्ची लगन से सत्संग सुने बिना नहीं होता।  जो व्यक्ति भक्ति करता है तो उसे भक्त कहते हैं यानि हंस पक्षी जैसा अहिंसावादी कहा जाता है अर्थात् भक्त किसी को कष्ट नहीं देता। हंस पक्षी भी सरोवर की मछली व कीड़े नहीं खाता। केवल मोती खाता है। काग पक्षी स्वार्थवश जीवित पशु-पक्षी का माँस नोच-नोचकर खाता है, कष्ट द...

‘‘भक्त के 16 गुण (आभूषण) ‘‘

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परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! भवसागर यानि काल लोक से निकलने के लिए भक्ति की शक्ति की आवश्यकता होती है। परमात्मा प्राप्ति के लिए जीव में सोलह (16) लक्षण अनिवार्य हैं। इनको आत्मा के सोलह सिंगार (आभूषण) कहा जाता है। 1 ज्ञान 2 विवेक 3 सत्य 4 संतोष 5 प्रेम भाव 6 धीरज 7 निरधोषा (धोखा रहित) 8 दया 9 क्षमा 10 शील 11 निष्कर्मा 12 त्याग 13 बैराग 14 शांति निज धर्मा 15 भक्ति कर निज जीव उबारै 16 मित्र सम सबको चित धारै। भावार्थ :- परमात्मा प्राप्ति के लिए भक्त में कुछ लक्षण विशेष होने चाहिऐं। ये 16 आभूषण अनिवार्य हैं। 1 तत्त्वज्ञान। 2 विवेक भाव। 3 सत्य भाषण । 4 परमात्मा के दिए में संतोष करे और उसको परमेश्वर की इच्छा जाने। 5 प्रेम भाव से भक्ति करे तथा अन्य से भी मृदु भाषा में बात करे। 6 धैर्य रखे, सतगुरू ने जो ज्ञान दिया है, उसकी सफलता के लिए हौंसला रखे फल की जल्दी न करे । 7 किसी के साथ दगा (धोखा) नहीं करे। 8 दया भाव रखे। 9 भक्त तथा संत का आभूषण क्षमा भी है। शत्रु को भी क्षमा कर देना चाहिए। 10 शील स्वभाव होना चाहिए। 11भक्ति को निष्काम भाव से करे, सांसारिक लाभ प्राप्ति के उ...